असलम शेर खान, एक चमकता नाम, जिसने 1972 ओलंपिक में ब्रॉन्ज मेडल हासिल किया, 1974 एशियाड में सिल्वर मेडल

 असलम भाई, 

आपने बहुत ही बड़ी बात कही कि मंदिर हिंदू का, मस्जिद मुसलमान की, चर्च ईसाईयों का, गुरुद्वारा सिखों का, और भी कई धर्म हैं हमारे इस महान देश में — पर राष्ट्रीय खेल हॉकी है, जिसके रचयिता हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद हैं और उस खेल की इबारत लिखने वाले सभी धर्मों के लोग।


धर्म पारिवारिक हो सकता है, सामाजिक हो सकता है, पर आस्था व्यक्तिगत होती है।


खुशी हुई आपका बहुत ही मज़बूत इंटरव्यू सुनकर (और अब मैं जोड़ रहा हूँ) और देखकर कि आपने कितनी बेहतरीन बातें की हैं — बहुत ही सहज तरीके से, जिससे इस मुल्क के हुक्मरानों को, जो भी हों, पता तो चलना चाहिए कि जो खिलाड़ी देश के लिए खेलता है, वह किसी भारतीय फौजी की तरह ही होता है।

वह सिर्फ अपनी जान न्योछावर नहीं कर पाता, पर वह देश की आन, बान और शान के लिए कार्य करता है।


1936 बर्लिन ओलंपिक की भारतीय हॉकी टीम को, जिसमें भोपाल के पहले ओलंपियन खिलाड़ी और आपके वालिद साहब जनाब अहमद शेर खान साहब भी खेल रहे थे, जिसके कप्तान ध्यानचंद थे — उस टीम को भोपाल की टीम ने ओलंपिक में जाने से पहले भोपाल में हरा दिया था, यह सबक देकर कि


> "घमंड मत करो कि तुम बड़े हो।"

पर उसी भारतीय टीम ने इस सबक से सीख लेकर बर्लिन ओलंपिक में नाजी तानाशाह हिटलर को, उसी की धरती पर, उसी की टीम को, उसी के देश में, उसी के सामने 8-1 के अंतर से पराजित किया।




और हिटलर, जो यह मैच देख रहा था इस घमंड के साथ कि जीत तो उसी की होगी — उसे मैदान छोड़कर भागना पड़ा, जिसे एक गुलाम देश की हॉकी टीम इंडिया ने हरा दिया।


सदी बीतने को है, भारतवासियों को भारत की आज़ादी से पहले जो सम्मान, गर्व और शोहरत भारतीय हॉकी ने नज़र कराई, उसमें एक खिलाड़ी आपके वालिद श्री अहमद शेर खान साहब का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा।


अस्लम शेर खान, एक चमकता नाम, जिसने 1972 ओलंपिक में ब्रॉन्ज मेडल हासिल किया,

1974 एशियाड में सिल्वर मेडल,

और 1975 हॉकी वर्ल्ड कप कुआलालंपुर में गोल्ड मेडल कैसे जीता गया — उसकी इबारत लिखी।


आज उनका एक इंटरव्यू — जिसे श्री संजीव श्रीवास्तव जी ने बहुत ही बेहतरीन अंदाज़ में लिया — उसमें असलम शेर खान ने कहा कि भोपाल के खिलाड़ी हॉकी को एक धर्म की ही तरह मानते हैं और

ओबेदुल्लाह हॉकी टूर्नामेंट उस खेल-धर्म का पर्व है,

जो एक शताब्दी से भी ज़्यादा वर्षों से खेला जाता रहा है।


इतने पुराने गौरवशाली भोपाल शहर के निवासियों द्वारा आयोजित यह हॉकी टूर्नामेंट — जिसे IOA के अधीन हॉकी इंडिया ने अपनी स्वीकृति दी है,

उसे राज्य सरकार/मध्यप्रदेश खेल विभाग सहमति नहीं दे रहा है।


जिसके लिए भारतीय हॉकी के महान खिलाड़ी — ओलंपिक मेडलिस्ट / वर्ल्ड कप विजेता — और उनके साथ भोपाल के दूसरे ओलंपियन और अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी आग्रह कर रहे हैं, निवेदन कर रहे हैं,

Request कर रहे हैं ओबेदुल्लाह हॉकी के लिए —

उन सबके आग्रह को, जो कभी उन्हीं का था, कोई जवाब न देना असल में अस्लम शेर का नहीं, हॉकी का अपमान है।

ध्यानचंद की रचना, जादुगरी की तोहिन है।


असलम शेर खान,

लगता है बात कुछ और ही है जिसे हम आप जैसे लोग नहीं समझ सकते।

कोशिश करते रहो। मेरी शुभकामनाएं।


– अशोक ध्यानचंद

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